• Prosperity
  • 16-Nov
आप नहीं, तो कौन? अब नहीं, तो कब?

हम भारत को समृद्ध होते, उभरते और गरीबी से बाहर निकलते देखना चाहते हैं, लेकिन यह कैसे होगा नहीं जानते। परअब हमें अपना यह गैर ज़िम्मेदाराना रवैया बदलना होगा।



क्या हम अपनी तकदीर बदल सकते हैं ? क्या हमारे पास वो ताकत है कि हम अपने देश की तकदीर बदल सकें ??? …तो मेरा जवाब है- हां ! हां, हमीं हैं अपनी तकदीर के मालिक ! हां, हमारे पास है वो शक्ति जिससे अपने भविष्य का निर्माण हम स्वयं कर सकें ! हां, हममें है वो ताकत कि एक ऐसी बेहतर दुनिया बनाएं जिसे विरासत में हम अपने बच्चों को सौंप सकें!



70 सालों तक हमने अपनी अहम ज़िम्मेदारी की उपेक्षा की है। हमारी अहम और पहली ज़िम्मेदारी थी- एक ऐसा समाज बनाना, जो निष्पक्ष हो, एक ऐसा समाज जो रचनात्मक हो, एक समृद्ध समाज जहां लोग एक-दूसरे की परवाह करते हों ! मगर ऐसा करने में हम नाकाम रहे। हमने अपने कर्तव्य की उपेक्षा की, हमने अपने समाज-धर्म का पालन नहीं किया।



हमने अपनी ज़िम्मेदारी राजनीतिक दलों पर डाल दी। और इसका अंजाम ये हुआ कि राजनीतिक दलों ने हमारी ज़िंदगी को अपने काबू में कर लिया। वे हमारे मालिक बन बैठे और हम बन गए उनके ज़र-ख़रीद ग़ुलाम। जनता की सारी दौलत हड़प कर मालिक दौलतमंद हो गया। … तो आप ही बताइए, अपनी आज़ादी के बदले में हमें क्या तोहफ़ा मिला?



किसी साल गैस सिलेंडर, किसी दूसरे साल सौर लालटेन, तो किसी साल साड़ी या फिर राशन की दुकान से अनाज के कुछ दाने !!! वाकई हमें ये सौदा बहुत ही महंगा पड़ा। उन्होंने हमारी आजादी छीन ली और बदले में क्या दिया हमें??? जैसे कोई ख़ैरात !!! उन्होंने हमें गरीब बना दिया और अपने कब्ज़े में रखा।



और हम खुद ही इन सबके ज़िम्मेदार हैं। ऐसा ही हमने अंग्रेजों के राज में किया था और नया राज आने के बाद हमने अपनी आज़ादी खुद उनके हाथों में सौंप दी। इन पॉलिटिकल पार्टियों को हमने अपना नया मालिक-मुख़्तार बना दिया।



अगर हम वाकई अपने परिवार, अपने बच्चों की परवाह करते हैं… अगर हम अपने देश की परवाह करते हैं तो हमें इसी वक्त इस चलन को रोकना होगा। हम किसी भी सूरत में अपने बच्चों को ऐसी ख़ौफनाक विरासत नहीं सौंप सकते ! अब हमें अपना मुकद्दर बदलना होगा।



तो सवाल ये है कि आख़िर हम इस प्राब्लम को कैसे सॉल्व कर सकते हैं? अपने जीवन की डोर हम कैसे अपने हाथों में ले सकते हैं?



…तो इसका जवाब बिल्कुल साफ है- हमें उसी सिस्टम का इस्तेमाल करके इन सबको बदलना है। हमारे पास एक बहुत कीमती चीज़ है… और वो है- हमारा वोट ! जी हां, बदलाव लाने के लिए हमें अपने इसी कीमती वोट का इस्तेमाल करना है।



…तो इसके लिए मेरा प्रपोज़ल ये है कि- हमें उन लोगों को चुनना होगा जो हमारे लिए यानी जनता के लिए काम करें नाकि अपने राजनीतिक दलों के लिए।



… और हम ये कैसे कर सकते हैं?



… तो मैं कहूंगा कि हम उन लोगों को चुनें जो हमें सरकार के चंगुल से आज़ाद कराने के लिए राजी हों। अपने इन इरादों को अंजाम देने के लिए हमारे पास एक ऐसा ही मंच है- ‘धन वापसी मंच’।



यहीं धन वापसी मंच में राजनीतिक दल के बदले आप अपना representative चुन सकते हैं। धन वापसी मंच के जरिए आपके द्वारा चुना गया यह प्रतिनिधि आपके लिए यानी जनता के लिए जवाबदेह रहेगा न कि राजनीतिक दल के आकाओं के लिए।



हमें उन्हीं उम्मीदवारों को चुनना होगा जो सार्वजनिक संपत्ति में से हमारा हिस्सा हमें वापस दिलवाएंगे। इस सार्वजनिक संपत्ति में से हर साल देश का हर परिवार 1 लाख रुपये का हिस्सेदार होगा। इन पैसों से हर भारतीय को अपनी किस्मत संवारने में मदद होगी। …और तब हर भारतीय आज़ाद और अमीर बनेगा।



आने वाले चुनाव में आपके हाथों में इस सिस्टम को बदलने की शक्ति होगी। वह केवल आप ही हैं जो अपनी आज़ादी को महफ़ूज़ रख सकते हैं। अपनी संपत्ति को वापस मांगने का अधिकार केवल आपके ही हाथ में है। सिर्फ़ और सिर्फ़ आप ही धन वापसी करवा सकते हैं।



आइए हमारे साथ, और इस क्रांति का हिस्सा बनिए ! यह आपको मालिक बनाएगा न कि नौकर !



इसके बारे में विस्तार से जानने के लिए DhanVapasi.com पर जा कर आप सारी जानकारी पढ़ सकते हैं।



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अभी इसके सदस्य बनें, साइन-अप करें और दूसरों को भी इसका सदस्य बनवाएं। हो सकता है कि आप में भी लीडर बनने की इच्छा जाग जाए।



अगर आप नहीं करेंगे तो और कौन करेगा?



… और अगर अभी नही करेंगे तो कब करेंगे???



जब हम सभी यह शुभ उत्सव मना रहे हैं, हम उम्मीद करते हैं कि आप कम भाग्यशाली लोगों के लिए भी थोड़ा विचार करेंगे। "मेरे मन की बात, आपके धन की बात" के नवीनतम संस्करण में, राजेश जैन गणपत मोची और उनके संघर्षों पर आधारित एक छोटी सी फिल्म के बारे में बात करते हैं।



जय हिंद !!!


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